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"लाडो"

                               "लाडो"
    
         तुम हो सदा प्यारी - प्यारी,
         मेरी नन्ही फुलवारी।
         तुझे देखकर मैं हंसती,
         खिलती कली ह्रदय में खिलती।
         सदा तू खुश रहे, दिल से दुआ निकलती,
         घर मेरा तेरी किलकारी से गूंजे।
         तूं ना चहके तो उदास मन मेरा,
         चले आंगन में जब पग तेरा।
         घर महके सुबह- शाम मेरा,
         बाहर जब तू चली जाये।
         चारों और सन्नाटा छा जाए,
         घर के भीतर जब तू आये।
         सब और उजियारा छा जाए,
         सबको करे तू दुलार, रखे सबका ख्याल।
        अपना रखे नही तू ध्यान,
         करे सबको खुशहाल।
         बाप को कहे राजा, 
         भैया को शहजादा।
         पुकारे अम्मा को रानी, 
         छोटी बहन को राजरानी ।
         अपने को भूला दे, 
         अपने भी भूलाए ।
         कैसी ये भूल - भूलैया,
         फिर भी ये दुनिया।
         बेटी को माने अभागन।
         दुआ मेरी तुझको, 
         महके सदा तेरा घर- आंगन। 

                                                  सुनीला देवी
                                          स्टाफ - हिन्दी शिक्षिका

कन्या भ्रूण हत्या

                     कन्या भ्रूण हत्या

अगर मेरा दुनिया में आना, 
भी तुमको मंजूर नहीं।
जिस दिन तरसोगे बेटी को, 
वो दिन दूर नहीं। 
                                

                                   अपना ही था खून तुम्हारा, 
                                   जिसको कोख में मार दिया।
                                   आज की बेटी कल की माँ है, 
                                   ये भी नहीं विचार किया।
                                   जान के भी अनजान बन गए, 
                                   होगा माफ कसूर नहीं।
                                   जिस दिन तरसोगे बेटी को, 
                                   वो दिन ज्यादा दूर नहीं।


बेटी हुई तो छाती पिटे,
बेटा हुआ तो फूल गई।
वंश चले न बिन बेटी के,
शायद तुम ये भूल गई।
बेटा लाभ हि बेटी हानि,
क्या ये बुरा फितूर नही।
जिस दिन तरसोगे बेटी को,
वो दिन ज्यादा दूर नही।
                                    

                                      माँ होगी ना बहन, 
                                      न पत्नि क्या होगी दुनिया में ।
                                      सोचो जब नारी ही न होगी.
                                      क्या होगा फिर दुनिया में ।
                                      बिन धरती कोई बीज भी पनपे, 
                                       कुदरत का दस्तूर नही ।
                                       जिस दिन तरसोगे बेटी को, 
                                       वो दिन ज्यादा दूर नही।


क्या खूब जवाब था एक बेटी का,
जब उससे पूछा गया।
की तुम्हारी दुनिया कंहा से शुरू होती है,
और कंहा पर खत्म। 
बेटी का जवाब था ।
माँ की कोख से शुरू होकर, 
पिता के चरणो से गुजर कर। 
पति की खुशी की गलियों से होकर,
बच्चों के सपनों को पूरा करने तक खत्म। 


                                       बेटी बचाओ 
                                       बेटी पढाओ 
                                      बेटी ही है सब कुछ है।

                                              हर्षिता शेखावत 
                                                 कक्षा - 5

असंभव पर संभव की जीत

                असंभव पर संभव की जीत 

      हर व्यक्ति के जीवन में कुछ कार्य ऐसे जरूर होते है जिन्हें करना हमेशा असंभव ही लगता है, और जब कोई दूसरा व्यक्त उसी असंभव काम को संभव करके दिखा देता है तो हमें लगता है कि यार वो तो बहुत भाग्यशाली है।
      दरअसल, असंभव कार्य को करने के लिए जितनी कठोर मेहनत की आवश्यकता होती है, उतनी आपने कभी की ही नही ........ कोई भी काम असंभव नही होता, बल्कि थोडा कठिन होता है जिसे आसानी से नही कर सकते तो बस हम उसे असंभव कहने लगते है, यही असंभव शब्द जब हमारे दिमाग में बैठ जाता है तो हम फिर प्रयास करना बंद कर देते है।
      आपको याद होगा कि पहले वन डे क्रिकेट में तीन सौ रन बनाना किसी भी टीम के लिए बहुत बङी बात होती धी। अगर किसी टीम ने तीन सौ रन बना लिए तो उसकी जीत निश्चित हो जाती थी क्योकि उस समय तक तीन सौ रन को पछाङना असंभव सा प्रतीत होता था।
       लेकिन समय बदला नये लोग आये पिच पर रन तेजी से बनने लगे और आज तो वन डे में तीन सौ रन मामूली सी बात है, अब तो लोग चार सौ रन को भी पछाङ देते है,
       पहले वन डे में शतक बनाने पर बहुत तारिफें होती थी और वन डे में दोहरा शतक लगाना तो असंभव ही था। उसके बारे में कोई सोचता ही नही था, 
       लेकिन हमारे मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर ने लोगों के इस भ्रम को तोङा और वन डे में दो सौ रन बनाकर एक कीर्तिमान स्थापित किया और यह कहानी यही नही रूकी , कुछ समय बाद विस्फ़ोटक बल्लेबाज विरेन्द्र सहवाग ने भी दोहरा शतक लगा दिया। इसके बाद दो सौ रन कई लोग बना चुके है। तो मित्रों असंभव कुछ था ही नही बल्कि काम बेहद कठिन था इसलिए हम उसे असंभव मान बैठे ।
        कोई फर्क नही पङता, अगर असंभव मान लिया 
       अरे फर्क नही पङता , अगर आपने प्रयास नही किया
       कोई फर्क पङता , अगर आपने हिम्मत छोङ दी
       लेकिन एक बात याद रखना दिन एक ऐसा शख्स आयेगा जो असंभव को संभव बना कर दिखा देगा और ऐसा करके वो शख्स दुनिया में छा जायेगा और सिर्फ यही बोलेगे कि वो भाग्यशाली है। दुनिया में मेहनत करने वालों कमी नही है। आप नही तो कोई और सही असंभव के चक्रव्यूह को कोई आकर चुटकियों में ढेर कर देगा।
        तो मित्रों असंभव शब्द को मन, मष्तिष्क से निकाल दीजिए क्योकि यह शब्द आपको आगे बढने से रोक रहा है।

                                           शिव प्रकाश कुम्हार 
                                               कक्षा :- 10

पर्यावरण बचाओ पर्यावरण (कविता)

              


                 पर्यावरण बचाओ 

पर्यावरण बचाओ , आज यही समय की मांग यही है, पर्यावरण बचाओ, ध्वनि, मिट्टी, जल, वायु आदि सब पर्यावरण बचाओ...........
जीव जगत के मित्र सभी ये, जीवन हमें देते सारे,               इनसे अपना नाता जोङो, इनको मित्र बनाओ,            पर्यावरण बचाओ.................
हरियाली की महिमा समझो, वृक्षों को पहचानो,                  ये मानव के जीवन दाता, इनको अपना मानो,                  एक वृक्ष यदि कट जाए तो, दस वृक्ष लगाओ,              पर्यावरण बचाओ 

                                              हिम्मत प्रजापत 
                                                   कक्षा - 10
                                           सत्र- 2019 - 2020

MAGAZINE 2019 -20

          विद्याकुंज शाला परिवार ने सत्र :- 2019 - 20 में एक पत्रिका "सृजन" का विमोचन किया था इस कि विशेषता यह है कि इस में छपी रचनाएं शाला के छात्र-छात्राओ और अध्यापकों द्वारा रचित है। यह हमारा प्रथम अंक है। इस के माध्यम से हम छात्र-छात्राओ के लेखन कला को निखारने का प्रयास कर रहे । हम चाहते हैं की बच्चे पढ़ाई लिखाई, हस्तशिल्प, खेलकूद, के साथ - साथ अपने अंदर छिपी प्रतिभा को पहचाने। इस अंक में छात्र-छात्राओ द्वारा रचित कविताएं , कहानियाँ, पहेलियाँ , लेख , अद्भुत तथ्य, अनमोल वचन, टंग - ट्विस्टर ये (हिन्दी, और अंग्रेजी) में लिखे गए है । ये सब शाला के छात्र-छात्राओ द्वारा लिखे गए है और संपादन का कार्य संपादकीय टीम जिसमे कक्षा 6 से 10 तक के छात्र-छात्राएं व अध्यापक सामिल थे के द्वारा किया गया । 
संपादकीय टीम:- 
 हिम्मत प्रजापत कक्षा-10
 निशा कुमावत कक्षा - 9
 पार्थराज कटारिया - 8
 वर्षा कंवर - 7
 सलोनी कुमावत कक्षा - 6
अनुसुईया भाटी अध्यापिका 
सुनिला देवी अध्यापिका 

इस अंक में छपी रचनाओं को आप के लिए प्रस्तुत कर रहे है आप इसका आन्नद ले।